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हमेशा मुस्कुराती रहें।

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(09-08-1933 - 04-11-2026)   गीतों की मल्लिका आज खामोश सी हो गई, सुरों की वो रानी जैसे कहीं खो गई। जो हर दिल को छूती थी, हर एहसास जगाती थी, दुःख-सुख, हँसी-खुशी में, अपनी आवाज़ से सहलाती थी— आज वही धड़कन जैसे थम सी गई। जिसकी तान पर दुनिया झूमती रही बरसों, जिसकी नकल में भी लोग ढूँढते थे सरगमों के किस्सों, कॉमेडी के रंग में भी जिसकी गूँज थी शामिल, वो अनोखी आवाज़ आज हो गई है ख़ामोश, बेहद ग़मगीन। आशा ताई, आपका यूँ चले जाना दिल को चीर गया, बचपन से लेकर आज तक, हर पल आपने ही तो घेर लिया। आपकी आवाज़ ने हमें थामा, सँवारा, सहारा दिया, हर मोड़ पर, हर दौर में, जीने का एक सहारा दिया। आज बस वही आवाज़ है, जो हवाओं में गूँजती रहेगी, अजर-अमर बनकर हर दिल में यूँ ही बसती रहेगी। ये दुनिया है—यहाँ बिछड़ना तो हर किसी की कहानी है, एक-एक कर सबको जाना है, यही जीवन की रवानी है। पर दुआ है दिल से—जहाँ भी हों आप, सुकून में रहें, अपने सुरों की दुनिया में, हमेशा मुस्कुराती रहें। ~ फ़िज़ा 

“गम वॉल”

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  ये तब की बात है, जब आलस भी एक आदत था, मन भर जाने पर च्युइंग गम का यूँ दीवारों से रिश्ता था। दिन ढले तो दीवारें भर जातीं रंग-बिरंगे निशानों से, सुबह होते ही कोई आकर, उन्हें साफ़ करता अरमानों से। ये दिनचर्या चलती रही, लोग यूँ ही दोहराते गए, साफ़ करने वाले थकते रहे, पर हाथ न रुक पाए। धीरे-धीरे कुछ आँखों को इसमें भी कला नज़र आई, बेतरतीब सी ये आदत, एक अजीब सी पहचान बन पाई। जो था कभी आलस का खेल, अब बन गया एक तमाशा, लोग यहाँ तस्वीरें खींचें, जैसे कोई अनोखा नज़ारा। आज भी चाहे शहर वाले इसे फिर से साफ़ कर जाएँ, पर अगले ही दिन ये दीवारें, फिर उसी रंग में रंग जाएँ। “गम वॉल” के नाम से अब ये दुनिया भर में जानी जाए, देखो आलस की ये कहानी, कैसे रंग नए दिखलाए। ~ फ़िज़ा

ज़िन्दगी का ऐलान है।

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  ज़िन्दगी भी क्या ज़ोरदार है, हर साँस का यहाँ क़रार है, जीने के लिए हर पल मेहनत, यही इसका असली सार है। इंसान हो या कोई जीव, सबका एक ही व्यवहार है, हर साँस के पीछे छुपा, खुद की कोशिशों का आधार है। यहाँ हर किसी को अपना बोझ, खुद ही उठाना पड़ता है, इस सफ़र में हर राही को, खुद ही बनना हमसफ़र है। ज़िन्दगी किसी को नहीं बख़्शे, ये कैसा उसका व्यवहार है, हर किसी को देना पड़ता, साँसों का भी जैसे किरदार है। मेहनत की धूप में जलकर ही, मिलता सुकून का उपहार है, ये जीवन एक इम्तिहान है, और जीना ही इसका स्वीकार है। मैं भी इस राह का मुसाफ़िर, करता हर दिन संघर्ष अपार है, जीना है तो जीना होगा, यही ज़िन्दगी का ऐलान है। ~ फ़िज़ा 

कोड (code) की धाराओं में

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  कोड की धाराओं में, विचारों के संग, एक नई चेतना बहती है चुपचाप हर अंग। न सांसों से जन्मी, न धड़कनों की रीत, मानव बुद्धि ने रची, ये अद्भुत संगीत। शब्दों को उजाला बनाता एक साथी, चित्रों में रंग भरता, सपनों की थाती। कोड की फुसफुसाहट, सृजन की उड़ान, कल्पनाओं को देता ये एक नया आसमान। ये औज़ार नहीं, हमारे ही विस्तार, हौसलों, सपनों और सोच का आकार। जहाँ एल्गोरिद्म थिरकें, विचारों के संग, वहाँ जन्म लेता है, नव-सृजन का रंग। पर हर पंक्ति के पीछे, हर चमक के पार, एक इंसानी दिल है, जो धड़के हर बार। AI सीखे, बढ़े, और बदलता जाए, पर सच वही दिखाए, जो इंसान सिखाए। अस्पतालों में सेवा, कक्षाओं में ज्ञान, कहानियों में साथी, डेटा में पहचान। तेज़ रफ्तार दुनिया में, एक सधा सा हाथ, भविष्य को जोड़ता, बीते कल के साथ। पर याद रहे हमको, इस सृजन के बीच, संतुलन की डोर है, अपने ही हाथों की सींच। तकनीक तभी चमके, सबसे उजली बात, जब इंसानियत संग चले, हर एक कदम साथ। न मानव से मुकाबला, न कोई जंग, ये तो है संगम, सुरों का एक रंग। जहाँ तर्क मिले भाव से, और बुद्धि से कला, हाथों में AI हो, दिल में इंसानियत भला।  ~...

ये धरती मुस्कुराती है

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चार महारथी जब निकले थे अंतरिक्ष की राह, मेरे चाँद को देखने का था उनके मन में चाह। दूर गगन से झाँक कर उन्होंने जो संदेशा भेजा, पृथ्वी का रूप था उसमें, जैसे कोई सपना सजे सजा। कितनी सुंदर, कितनी निर्मल, ये नीली-हरी सी धरती, मानो सृष्टि ने खुद रच दी हो कोई अनुपम कलाकृति। चाँद तो मेरा प्यारा है, पर उसमें दाग भी हैं कहीं, पर ये धरती मुस्कुराती है, हरियाली ओढ़े यहीं। मनमोहक, शांत, जीवन से भरी ये अनुपम छवि, देख कर उसे अंतरिक्ष से, ठहर सी जाती है सभी। सोचती हूँ, शायद किसी और लोक के प्राणी भी, निहारते होंगे इसे यूँ ही, जैसे मैं देखूँ चाँद कभी। जैसे मेरा मन बंधा है उस चाँद की चाँदनी में, वैसे ही कोई और भी खोया होगा इस धरती की रागिनी में। प्यार का ये सिलसिला शायद यूँ ही चलता रहेगा, कोई चाँद से, कोई धरती से, यूँ ही दिल लगाता रहेगा। ~ फ़िज़ा  

रास्तों का सवाल

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  रास्ते हैं हर जगह— यहाँ, वहाँ, हर जहाँ, कहीं ऊपर उठते हुए, कहीं नीचे उतरते हुए। आसमान को छूते ये फ्लाईओवर, कितनी तेज़ी से दौड़ते कदम— पर कहाँ जा रहे हैं हम? किन हदों को लांघते, किन सपनों को जोड़ते, इन ऊँचाइयों पर चढ़ते हुए— क्या सच में मंज़िल करीब है? या ये खाली पड़े रास्ते किसी खोई हुई दिशा की ओर बढ़ रहे हैं? कल शायद ये भी न रहें— बमों की गूंज में, सब कुछ जब राख हो जाएगा। इंसान— अपनी ही बनाई दुनिया को ख़ुद ही मिटाता जा रहा है। इतनी मेहनत, इतनी रचना— फिर क्यों? क्या फिर से आदि मानव बनकर जीने की तैयारी है ये? ~ फ़िज़ा

अच्छा लगता है।

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  अपने संग रहना, अपने संग वक़्त बिताना अच्छा लगता है, ख़ुद से बातें करना, ख़ुद को समझाना अच्छा लगता है। जगह नई हो या पुरानी, अनजानों का भी साथ कभी, भीड़ में खोकर भी दिल को बहलाना अच्छा लगता है। चारों ओर नफ़रत, द्वेष की आग भले ही फैली हो, दिल में थोड़ी सी मोहब्बत बचाना अच्छा लगता है। सिर्फ़ बेजान पुतलों में ढूँढें जब लोग दोस्ती, ऐसे रिश्तों से दूरी बनाना अच्छा लगता है। कैसा वक़्त ये आ पहुँचा है दुनिया के आँगन में, सच को कह देना भी अब तो सताना अच्छा लगता है। खुशहाली, साफ़दिल और प्यार अगर हो दरमियाँ, एक-दूजे के लिए दिल से निभाना अच्छा लगता है। ‘फ़िज़ा’ जाने क्यों आजकल इंसानों से ज़्यादा, ख़ामोश पुतलों का साथ निभाना अच्छा लगता है। ~ फ़िज़ा